कोबरा दूध नहीं पीता
आजीविका छीननें से जीवन अब घोर आर्थिक तंगी में गुजरने को मजबूर
नगरी /राजशेखर /

सपेरों का जीवन अब घोर आर्थिक तंगी और अवैध तस्करी के आरोपों के बीच संघर्ष बन गया है। वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट के तहत सांपों को पालने पर प्रतिबंध से वे बेरोजगार हो गए हैं और पारंपरिक आजीविका छीन गई है।
वे अभी भी सांप दिखाकर पेट भरने को मजबूर हैं.
ग्राम अमाली के यादव होटल में सुबह-सुबह तिल्दा नेवरा के जोगी नाथ सपेरे ने पदुम नाग दिखाते हुए बताया की ईंट भट्टे में काम करने के दौरान उन्हें पदुम नाग नजर आया, मुख्य रूप से इंडियन कोबरा कहा जाता है।’पदुम’ शब्द अक्सर उस कोबरा के लिए इस्तेमाल होता है जिसके फन पर चश्मे के आकार का निशान होता है, जिसे स्थानीय स्तर पर “पद्म” का निशान माना जाता है।जहरीला: यह सांप अत्यधिक विषैले होते हैं।
इस सांप को दो-तीन दिन अपने पास रखकर गांव गांव घूम कर कुछ पैसे कमाने के बाद छोड़ दूंगा, जोगी नाथ ने बताया कि सांप को भोजन के लिए चूहे, मेंढक जैसे छोटे जीवो को मारकर सांप की टोकनी में डाल दिया जाता है दो-तीन दिन जब तक छोड़ नहीं जाएगा तब तक इसी आहार पर सांप जिंदा रहेगा. उनके अनुसार वे सांप के काटने से जहर का उपचार भी करते हैं. उन्होंने बताया कि मजबूरी में सांप दिखाकर पेट पालना पड़ रहा है
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